: कच्छ के चर्चों में मध्यरात्रि प्रार्थना के साथ ही क्रिसमस पर्व की धूमधाम से शुरुआत हुई। भुजिया डूंगर के तलहटी में स्थित मंदिरों में रंग-बिरंगी रोशनी से दिवाली जैसी जगमगाहट फैली। ठंड के बीच भी क्रिसमस का माहौल बिल्कुल वाइट क्रिसमस जैसा रहा।
भुज के विक्टोरियन युग के सेंट एंड्रयूज़ चर्च में क्रिसमस की पूर्व मध्यरात्रि में ‘मिडनाइट प्रेयर’ आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय ईसाई परिवार शामिल हुए। इसके अलावा धाणेटी और नाडापा के मिशनरी स्कूलों में भी उत्सव मनाया गया।
भुज, गांधीधाम, मुण्डरा और कंडला में भी चर्चों में क्रिसमस की चमक देखी गई। भुज में भूकंप के बाद औद्योगीकरण से ईसाई परिवारों की संख्या बढ़ी है, जिससे क्रिसमस का उत्सव और रंगीन हो गया है। शहर के बाजारों में सांता क्लॉज के कट-आउट और क्रिसमस ट्री की रोशनी देखी जा सकती है। लोग अब प्लास्टिक क्रिसमस ट्री की जगह असली क्रिसमस ट्री की ओर बढ़ रहे हैं।
धोरड़ो के सफेद रण में चल रहे रणोत्सव में भी क्रिसमस का असर दिखाई दिया। क्रिसमस का एक उद्देश्य लंबे दिनों के दौरान सूर्य की किरणों को बढ़ाना और अंधकार को कम करना भी है।
सांता क्लॉज का असली नाम संत निकोलस है, जो 270 ईस्वी में भूमध्य सागर के तुर्की के पटारा शहर में जन्मे थे। क्रिसमस ट्री का पर्व में विशेष महत्व है, यह ‘एवरग्रीन’ जीवन का संदेश देता है और उस पर लगी रोशनी प्रभु यीशु का प्रकाश दिखाती है। इसका आकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का प्रतीक है। 16वीं सदी से जर्मनी में क्रिसमस ट्री की परंपरा शुरू हुई, जो बाद में इंग्लैंड और अमेरिका में भी लोकप्रिय हुई।
जिंगल बेल्स भी क्रिसमस में विशेष महत्व रखते हैं और इनका उपयोग क्रिसमस गीतों और सांता क्लॉज के चित्रण में होता है।

