महाराष्ट्र में AIMIM की बढ़ती ताकत: नगर निकाय चुनावों के बाद बदले राजनीतिक समीकरण, जानिए कैसे ओवैसी की पार्टी बनी निर्णायक फैक्टर

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महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न नगर पालिका और नगर निगम चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे दिया है। बड़े और पारंपरिक राजनीतिक दलों के बिखराव के बीच अल्पसंख्यक समुदाय आधारित पार्टियां संगठित होकर अपनी पकड़ मजबूत करती नजर आ रही हैं। खास तौर पर असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने महाराष्ट्र में ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है।

अब तक हैदराबाद और तेलंगाना तक सीमित मानी जाने वाली AIMIM ने महाराष्ट्र की नगर निकाय राजनीति में जोरदार एंट्री की है। हालिया नगर निगम चुनावों में पार्टी ने राज्य की 13 म्युनिसिपल कॉरपोरेशनों में कुल 126 काउंसलर सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। यह प्रदर्शन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि सीमित संसाधनों और कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी ने बड़े दलों के वोट गणित को प्रभावित किया है।

AIMIM का संगठनात्मक गढ़ लंबे समय से हैदराबाद रहा है। तेलंगाना में पार्टी के पास 7 विधायक, 2 एमएलसी, 67 म्युनिसिपल काउंसिलर और 70 अन्य काउंसलर हैं। तेलंगाना के बाहर बिहार में भी AIMIM के 5 विधायक हैं। पार्टी लगातार शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में अल्पसंख्यक मतदाताओं को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है।

महाराष्ट्र में AIMIM का प्रदर्शन शरद पवार की एनसीपी से कहीं बेहतर रहा है। जहां AIMIM को 126 काउंसलर सीटें मिलीं, वहीं एनसीपी इससे काफी पीछे रह गई। यहां तक कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) से भी AIMIM केवल करीब 30 सीट पीछे रही। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि पार्टी अब राज्य की राजनीति में एक मजबूत खिलाड़ी बनकर उभर रही है।

AIMIM ने 2024 की महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मालेगांव सेंट्रल सीट जीतकर यह साफ कर दिया था कि अल्पसंख्यक बहुल शहरी क्षेत्रों में उसकी जड़ें गहरी हो चुकी हैं। नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने इस दावे को और मजबूत किया है।

AIMIM का प्रभाव केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी भले ही कोई सीट नहीं जीत पाई, लेकिन मुस्तफाबाद सीट पर उसे 33,474 वोट मिले, जहां मुस्लिम आबादी करीब 40 प्रतिशत है। विपक्षी वोटों के बंटवारे के कारण भाजपा के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की, जिससे AIMIM एक निर्णायक फैक्टर बनकर उभरी।

इसी तरह 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी AIMIM ने सीमित सीटों पर चुनाव लड़ते हुए कई इलाकों में समाजवादी पार्टी गठबंधन से ज्यादा वोट हासिल किए। बिजनौर, मुरादाबाद नगर समेत कई सीटों पर AIMIM की मौजूदगी ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM की असली ताकत सीट जीतने से ज्यादा चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने में है। पार्टी की मौजूदगी विपक्षी दलों को अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने को मजबूर करती है और कई बार वोटों के ध्रुवीकरण को भी तेज करती है।

AIMIM के विस्तार के केंद्र में असदुद्दीन ओवैसी की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। उनकी प्रभावशाली भाषण शैली, आक्रामक तर्क और संसद में मजबूत उपस्थिति ने उन्हें कांग्रेस के बाहर सबसे प्रमुख मुस्लिम नेता के रूप में स्थापित किया है। शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं, खासकर कम शिक्षित वर्ग में, उन्हें एक प्रभावी और प्रेरक आवाज के रूप में देखा जाता है।

संसद में ओवैसी अल्पसंख्यक अधिकारों, नागरिकता कानून और शहरी मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों पर तीखे सवाल उठाते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संसदीय संपर्कों और हालिया वैश्विक घटनाओं के बाद उनकी पहचान और मजबूत हुई है।

कुल मिलाकर, AIMIM अब केवल एक क्षेत्रीय पार्टी नहीं रही। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में उसका बढ़ता प्रभाव उसे एक ऐसी राजनीतिक शक्ति बना रहा है, जो भले ही सीमित सीटें जीते, लेकिन चुनावी नतीजों और राष्ट्रीय बहस को दिशा देने में अहम भूमिका निभा रही है।

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Author: sajagkutch

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