केंद्र सरकार का दावा है कि अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा—जिसमें 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा तय की गई है—के तहत केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र ही खनन योग्य है। हालांकि, इस दावे को खारिज करती एक स्वतंत्र वैज्ञानिक स्टडी सामने आई है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि अरावली का लगभग एक-तिहाई हिस्सा गंभीर खतरे में है।
31.8 प्रतिशत अरावली क्षेत्र खनन के दायरे में आने का दावा
सैटेलाइट डेटा के आधार पर तैयार इस अध्ययन में बताया गया है कि अरावली का 31.8 प्रतिशत क्षेत्र केंद्र सरकार की 100 मीटर वाली परिभाषा के अंतर्गत आ जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि करीब 31 प्रतिशत क्षेत्र को खनन के लिए चुना जा सकता है, जिससे अरावली पर्वतमाला पर भारी पर्यावरणीय संकट पैदा हो सकता है।
जलवायु वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. सुधांशु ने कहा कि यह शोध नीतिगत खामियों को गंभीर रूप से उजागर करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि छोटी पहाड़ियों को गलत तरीके से ‘बंजर भूमि’ (वेस्टलैंड) के रूप में दिखाया जा रहा है, जबकि वे पारिस्थितिकी के लिए बेहद अहम हैं।
छोटी पहाड़ियां ही भूजल संरक्षण की रीढ़
अध्ययन के अनुसार, जिन छोटी पहाड़ियों को नजरअंदाज किया जा रहा है, वही भूगर्भ जल संचयन (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि इन क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी गई, तो भूजल स्तर तेजी से गिर सकता है।
लाखों लोगों पर मंडराएगा जल और पर्यावरण संकट
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अरावली में बड़े पैमाने पर खनन से हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के लाखों लोगों पर पानी और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।
यदि अरावली क्षेत्र में खुदाई बढ़ी, तो राजस्थान में मरुस्थलीकरण तेज होगा और थार मरुस्थल का विस्तार होने लगेगा।
जयपुर, गुरुग्राम और दिल्ली की जल आपूर्ति पर खतरा
अरावली की पहाड़ियां प्राकृतिक जल भंडारण प्रणाली की तरह काम करती हैं। इन्हीं पहाड़ियों के कारण जयपुर, गुरुग्राम और दिल्ली जैसे शहरों को पीने का पानी उपलब्ध हो पाता है।
खनन की अनुमति मिलने पर यह जल स्रोत धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है, जिससे भविष्य में भीषण जल संकट खड़ा हो जाएगा।
अरावली क्षेत्र में चल रहे खनन पर तत्काल रोक की मांग
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चित्तौड़गढ़, नागौर, बूंदी और सवाई माधोपुर जैसे क्षेत्रों में पहले से चल रहा खनन तत्काल रोका जाना चाहिए, क्योंकि ये इलाके भी अरावली पर्वतमाला का हिस्सा हैं।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय नुकसान के रूप में सामने आ सकते हैं।
