प्रेस और मीडिया के कुछ वर्गों में ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ आईडीबीआई में सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित वर्ष 2003 के विधायी घटनाक्रमों पर टिप्पणियाँ/विचार व्यक्त किए गए हैं। यह दोहराया जाता है कि केंद्रीय बजट, 2003 पर चर्चा तथा आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 पर संसदीय बहस के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कमी को सीमित करने के उद्देश्य से एक संशोधन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन अंततः उसे अस्वीकार कर दिया गया और वह अधिनियमित कानून का हिस्सा नहीं बना।
इस मामले की बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में जाँच की गई, जिसका निर्णय 17 दिसंबर, 2018 को सुनाया गया। रिट याचिका खारिज करते हुए न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा 41 और 42 में निम्नलिखित निर्णय दिया:
पैरा 41:
“इस न्यायालय का मत है कि लगभग 15 वर्ष पूर्व विधायी कार्यवाही से संबंधित एक बहस के दौरान सदन के समक्ष दिए गए वक्तव्य, केंद्र सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने से नहीं रोकेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बहस के बाद संसद द्वारा अधिनियमित कानून में उस संशोधन को शामिल नहीं किया गया था, जिसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया था। सदन के समक्ष दिए गए वक्तव्य संसद द्वारा अधिनियमित कानून का स्थान नहीं ले सकते और न ही उसे निष्प्रभावी कर सकते हैं। निस्संदेह, संसद इस बात से अवगत थी कि प्रस्तावित परंतुक को शामिल न करने के क्या निहितार्थ होंगे। उक्त संदर्भ में वचनबद्धता विबंधन (प्रॉमिसरी एस्टॉपल) के सिद्धांत पूरी तरह से लागू नहीं होते। यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि संसद में दिए गए वक्तव्य कर्मचारियों के प्रति किए गए किसी आश्वासन के समान थे और कर्मचारियों ने उस आश्वासन के आधार पर अपने हितों के प्रतिकूल कार्य किया। सदन के समक्ष दिए गए वक्तव्य एक कानून (आईडीबीआई निरसन अधिनियम, 2003) के अधिनियमन के संदर्भ में थे और उक्त अधिनियम की व्याख्या विधियों की व्याख्या के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप ही की जानी चाहिए।”
पैरा 42:
“आईडीबीआई निरसन अधिनियम, 2003 की भाषा में कोई अस्पष्टता नहीं है और उक्त अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान निहितार्थ के आधार पर पढ़े जाने की कोई गुंजाइश नहीं है, जो सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने या उससे अपनी हिस्सेदारी पूरी तरह समाप्त करने से रोकता हो।”
उपर्युक्त निर्णय महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें वचनबद्धता विबंधन (प्रॉमिसरी एस्टॉपल) के सिद्धांत पर विशेष रूप से विचार किया गया है, जिसका सहारा सरकार के हिस्सेदारी में कमी करने के निर्णय को चुनौती देने के लिए लिया गया था। इस सिद्धांत का उपयोग सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने या उससे अपनी हिस्सेदारी पूरी तरह समाप्त करने से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता था।
आईडीबीआई बैंक के रूपांतरण और रणनीतिक विनिवेश के संबंध में सरकार की नीति को संसद में लगातार प्रस्तुत किए गए केंद्रीय बजट भाषणों में दोहराया गया था:
केंद्रीय बजट 2016-17 — तत्कालीन माननीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली के भाषण (पैरा 93) में कहा गया था:
“हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सशक्त और प्रतिस्पर्धी बनना होगा। बैंक बोर्ड ब्यूरो को 2016-17 के दौरान कार्यान्वित किया जाएगा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के समेकन के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत किया जाएगा। आईडीबीआई बैंक के रूपांतरण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। सरकार इसे आगे बढ़ाएगी और अपनी हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत से कम करने के विकल्प पर भी विचार करेगी।”
केंद्रीय बजट 2021-22 — तत्कालीन माननीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण के भाषण (पैरा 84) में कहा गया था:
“कोविड-19 के बावजूद, हमने रणनीतिक विनिवेश की दिशा में काम जारी रखा है। बीपीसीएल, एयर इंडिया, भारतीय नौवहन निगम, भारतीय कंटेनर निगम, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड सहित कई संस्थाओं से संबंधित लेन-देन 2021-22 में पूरे किए जाएंगे। आईडीबीआई बैंक के अलावा, हम वर्ष 2021-22 में दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव करते हैं। इसके लिए विधायी संशोधनों की आवश्यकता होगी और मैं इसी सत्र में संशोधन प्रस्तुत करने का प्रस्ताव करती हूँ।”
आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 का विधायी इतिहास, माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायिक निर्णय और लगातार प्रस्तुत किए गए केंद्रीय बजट भाषण सामूहिक रूप से आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के संबंध में सरकार की नीति के विकास को दर्शाते हैं। दिनांक 17 दिसंबर, 2018 का निर्णय स्पष्ट करता है कि संसदीय बहसों के दौरान दिए गए वक्तव्यों के आधार पर वचनबद्धता विबंधन (प्रॉमिसरी एस्टॉपल) के सिद्धांत का सहारा लेकर आईडीबीआई बैंक लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने की सरकार की शक्ति को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि अधिनियमित कानून में आईडीबीआई बैंक लिमिटेड में सरकार की हिस्सेदारी कम करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था।
