सूरत के नासिरनगर क्षेत्र में हुई मकानों की तोड़फोड़ को लेकर उठे विवाद के बीच सूरत महानगरपालिका (SMC) ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि निगम ने किसी भी प्रकार की आधिकारिक तोड़फोड़ कार्रवाई नहीं की थी। इस मामले में अतिरिक्त नगर अभियंता अशिष नायक ने कहा कि निगम के अधिकारी केवल जमीन की सीमा निर्धारण (डिमार्केशन) प्रक्रिया के लिए मौके पर मौजूद थे और जब उनकी टीम वहां पहुंची, तब तक निजी मशीनें पहले से काम कर रही थीं।
नासिरनगर क्षेत्र में हाल ही में बड़ी संख्या में झोपड़ियों और मकानों को गिराए जाने के बाद स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी फैल गई। प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना दिए बिना कार्रवाई की गई, जिससे अनेक परिवार बेघर हो गए। इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए और मामला गुजरात हाईकोर्ट तक पहुंच गया है।
SMC का कहना है कि उसने किसी भी प्रकार का विध्वंस आदेश जारी नहीं किया था। निगम अधिकारियों के अनुसार, वे केवल भूमि की स्थिति और सीमांकन की प्रक्रिया में शामिल थे। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों और विपक्षी दलों का दावा है कि कार्रवाई के दौरान पुलिस और निगम के कर्मचारी मौजूद थे, इसलिए पूरे घटनाक्रम पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
विवाद बढ़ने के बाद सूरत महानगरपालिका आयुक्त ने पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन किया है। समिति यह पता लगाएगी कि घटनास्थल पर मौजूद अधिकारियों की क्या भूमिका थी और वास्तव में तोड़फोड़ की कार्रवाई किसके निर्देश पर तथा किस एजेंसी द्वारा की गई।
इस बीच प्रभावित परिवारों की ओर से अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया गया है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और पुनर्वास की कोई व्यवस्था भी नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कई परिवार दशकों से वहां रह रहे थे और उनके पास कर भुगतान तथा बिजली कनेक्शन जैसे दस्तावेज भी मौजूद हैं।
नासिरनगर प्रकरण अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, कानूनी प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। जांच समिति की रिपोर्ट और हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस विवादास्पद तोड़फोड़ के लिए वास्तविक जिम्मेदारी किसकी थी।
