चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य मौजूदगी को अब एक अस्थायी अभ्यास के बजाय दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बना लिया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चीनी नौसेना और तटरक्षक बल लगातार ताइवान के चारों ओर युद्धपोतों और अन्य समुद्री जहाजों की तैनाती बढ़ा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग अब केवल सैन्य अभ्यासों के माध्यम से दबाव बनाने के बजाय ताइवान के चारों ओर लगभग स्थायी समुद्री घेरा स्थापित करना चाहता है। इस रणनीति का उद्देश्य ताइवान पर मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सामरिक दबाव बढ़ाना है, ताकि बिना सीधे युद्ध के उसे चीन की शर्तें मानने के लिए मजबूर किया जा सके।
हाल के वर्षों में चीन ने कई बार बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास किए हैं, जिनमें लड़ाकू विमान, युद्धपोत और तटरक्षक जहाज ताइवान के आसपास तैनात किए गए। इन अभ्यासों को विशेषज्ञ ताइवान की संभावित नाकेबंदी और घेराबंदी के परीक्षण के रूप में देखते हैं। चीन की सेना ने ऐसे अभियानों में यह भी प्रदर्शित किया है कि वह आवश्यकता पड़ने पर ताइवान को समुद्री मार्गों से दुनिया से अलग करने की क्षमता रखती है।
चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और लंबे समय से उसके एकीकरण की बात करता रहा है। वहीं ताइवान स्वयं को एक लोकतांत्रिक और स्वशासित इकाई मानता है। इस मुद्दे पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि वे ताइवान की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के समर्थन की बात करते रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, चीन की यह नई समुद्री रणनीति सीधे युद्ध छेड़े बिना ताइवान पर दबाव बढ़ाने का एक तरीका है। लगातार युद्धपोतों की तैनाती से चीन क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन भी कर रहा है और यह संदेश दे रहा है कि ताइवान जलडमरूमध्य में उसकी उपस्थिति अब सामान्य और स्थायी होती जा रही है।
इस बढ़ती सैन्य गतिविधि ने पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव इसी प्रकार बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में ताइवान मुद्दा वैश्विक राजनीति और सुरक्षा का सबसे संवेदनशील विषय बन सकता है।
