पूज्य स्वामी जी ने ही दिया था। आज विवेकानंद रॉक मेमोरियल, देश और दुनिया से आने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र है।
साथियों,
आज उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम, भारत के सांस्कृतिक केन्द्रों का पुनर्जागरण हो रहा है। काशी विश्वनाथ धाम का नया स्वरूप हो, अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर हो, उज्जैन का महाकाल महालोक हो या केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे हमारे धाम हों। पिछले दिनों अगर आप केदारनाथ जी गए हो, तो वहां आदि शंकर की, आदि शंकराचार्य जी की एक दिव्य भव्य प्रतिमा को वहां स्थापित किया गया है। जहां पर आदि शंकर ने अपना देह छोड़ा था। आज वो अपने भव्य स्वरूप में वापस लौट रहे हैं। आप सभी को पता है कि एक समय में भारत से कितनी ही मूर्तियां चोरी करके विदेश ले जाई गईं, वहां बेच दी गईं। इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था, पूछने वाला कोई नहीं था, पूजने वालों की तो छोड़ों, पूछने वाला नहीं था। बीते 12 वर्षों में हम ऐसी साढ़े छह सौ से ज्यादा चोरी की गई प्राचीन मूर्तियाँ भी वापस लेकर आए हैं। हमारे सांस्कृतिक केन्द्र ‘यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट’ का हिस्सा बन रहे हैं।
साथियों,
जैसे स्वामी जी हमारे धर्म और दर्शन को दुनिया के लोगों तक लेकर गए थे, वैसे ही आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विश्व भर के लोगों को भारत से जोड़ रहा है, अपनी पुरातन महान परंपरा से जोड़ रहा है। अपनी विरासत पर गर्व का ये आत्मविश्वास, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का ये भरोसा, ये इस बात का प्रमाण है कि देश अब उस राह पर आगे बढ़ रहा है, जिसका सपना हमारे ऋषियों और राष्ट्रभक्तों ने सदियों से देखा था। उनकी विचारशक्ति इस राह में हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
साथियों,
अलग-अलग संस्थानों और संस्थाओं के अपने-अपने उद्देश्य होते हैं, लेकिन एक उद्देश्य जो सबको जोड़ता है, वो मंजिल जहां सभी रास्ते साथ जुड़ जाते हैं, वो लक्ष्य है – देश का विकास, देश का गौरव। स्वामी चिन्मयानंद जी के समय में देश के सामने जो चुनौतियाँ थीं, उस समय उन्होंने उस हिसाब से अपने संकल्पों को गढ़ा। बीते दशकों में समय बदला है, देश के सामने नई चुनौतियाँ पैदा हुई हैं, समाज में नई विकृतियाँ आई हैं। आज उनके समाधान का दायित्व हम सबके ऊपर है। आज हमें बांटने वाली ताकतों के खिलाफ समाज को एकजुट करना है, हमें आत्मनिर्भरता के लिए देशवासियों को जागरूक करना है। 2047 में विकसित भारत के संकल्प से जन-जन को जोड़ना है। इन उद्देश्यों के लिए हमें और सक्रिय होना है।
साथियों,
2047 में भारत जब अपनी आज़ादी के 100 साल पूरे करेगा, उसी कालखंड में चिन्मय मिशन भी अपनी शताब्दी का वर्ष मनाएगा। यानी, चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा और विकसित भारत की यात्रा, एक साथ आगे बढ़ेगी। इसलिए, हमारे लक्ष्य भी एक हैं, उद्देश्य भी एक हैं और हमें इस यात्रा को एक साथ आगे बढ़ाना है। आपके पास गुरुदेव की महान विरासत है, दशकों का अनुभव है। दुनियाभर में समर्पित आचार्यों, साधकों और कार्यकर्ताओं का एक विशाल परिवार है। मुझे विश्वास है, आप सब मिलकर विकसित भारत के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे। इसी विश्वास के साथ मैं एक बार फिर पूज्य गुरुदेव के चरणों में नमन करता हूं। चिन्मय मिशन के सभी संतों, आचार्यों, साधकों और सेवाभावी साथियों को,अमृत महोत्सव की बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
हरि ओम।
हरि ओम।
हरि ओम।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
