करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल अपमानजनक या अभद्र भाषा का प्रयोग करना अपने आप में SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि ऐसा अपमान पीड़ित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर किया गया हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली केशव कुमार महतो की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया और कहा कि SC-ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध तभी बनता है, जब आरोपी का उद्देश्य पीड़ित को उसकी जातिगत पहचान के कारण अपमानित करना या धमकाना हो। अदालत ने पाया कि इस मामले में दर्ज FIR और चार्जशीट में जाति के आधार पर अपमान किए जाने के कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
मामले के अनुसार, केशव कुमार महतो पर एक आंगनवाड़ी केंद्र में कथित रूप से जाति आधारित गाली-गलौज और मारपीट का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया गया था। पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि शिकायतकर्ता SC या ST समुदाय से संबंध रखता है, हर विवाद को इस अधिनियम के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए दो अनिवार्य शर्तों पर जोर दिया। पहली शर्त यह है कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना चाहिए। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि आरोपी द्वारा किया गया अपमान या धमकी सीधे तौर पर पीड़ित की जातिगत स्थिति को लक्ष्य बनाकर दी गई हो।
अदालत ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि यदि किसी सामान्य विवाद के दौरान अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया हो, लेकिन उसके पीछे जातिगत वैमनस्य या अपमान का स्पष्ट इरादा न हो, तो ऐसे मामले को SC-ST एक्ट के तहत अत्याचार नहीं माना जा सकता। इस फैसले को कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने और वास्तविक पीड़ितों को न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
