देश की करोड़ों गृहिणियों के योगदान को सम्मान देने वाले एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गृहिणियां केवल परिवार ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें “नेशन बिल्डर्स” अर्थात “राष्ट्र निर्माता” की संज्ञा देते हुए निर्देश दिया कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों का आर्थिक मूल्य भी माना जाए।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी गृहिणी के निधन या गंभीर क्षति की स्थिति में उसके द्वारा परिवार को दी जाने वाली घरेलू सेवाओं को अलग श्रेणी के मुआवजे के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए अदालत ने घरेलू देखभाल और पारिवारिक योगदान का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है। यह राशि उन मामलों में आधार मानी जाएगी जहां गृहिणी की कोई प्रत्यक्ष आय नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि गृहिणी का योगदान केवल खाना बनाने या घर संभालने तक सीमित नहीं होता। वह बच्चों के पालन-पोषण, परिवार के भावनात्मक और सामाजिक विकास तथा समाज के भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए उनके श्रम को आर्थिक दृष्टि से कम आंकना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि लंबे समय से गृहिणियों के कार्य को बिना वेतन वाला कार्य मानकर उसकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा है। अब समय आ गया है कि उनके श्रम, त्याग और सेवाओं को उचित कानूनी मान्यता मिले। न्यायालय ने इस फैसले को सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
यह फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में दुर्घटना, बीमा और मुआवजा संबंधी मामलों में गृहिणियों के योगदान का आकलन अधिक सम्मानजनक और वास्तविक आधार पर किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को महिलाओं के अदृश्य श्रम को पहचान देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि घर और परिवार को संभालने वाली महिलाओं का योगदान किसी वेतनभोगी कर्मचारी से कम नहीं है, बल्कि उनका कार्य समाज और राष्ट्र की नींव को मजबूत करता है।
