चीन ताइवान पर दबाव बढ़ाने के लिए अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग अब ताइवान के आसपास युद्धपोतों और तटरक्षक जहाजों की लगभग स्थायी तैनाती को अपनी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बना रहा है। इसका उद्देश्य ताइवान पर लगातार मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए रखना है, बिना सीधे युद्ध की स्थिति पैदा किए।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह नीति तथाकथित “ग्रे-ज़ोन वारफेयर” का हिस्सा है, जिसमें पूर्ण सैन्य आक्रमण के बजाय लगातार सैन्य मौजूदगी, नौसैनिक गश्त, ड्रोन गतिविधियां और समुद्री निगरानी के जरिए विरोधी पक्ष को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। हाल के महीनों में चीनी नौसेना और तटरक्षक जहाजों की ताइवान के आसपास गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ताइवान को सीधे सैन्य हमले के बजाय धीरे-धीरे घेरकर उसकी सामरिक और आर्थिक स्थिति को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहा है। बीजिंग का लक्ष्य ताइवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना और उसे चीन के साथ राजनीतिक समझौते के लिए मजबूर करना हो सकता है।
ताइवान सरकार ने चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर चिंता जताते हुए कहा है कि वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। ताइवान की सेना लगातार निगरानी रख रही है और संभावित खतरों से निपटने के लिए अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर रही है।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने भी चीन की इन गतिविधियों पर नजर बनाए रखी है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान के चारों ओर स्थायी नौसैनिक दबाव भविष्य में किसी संभावित नाकेबंदी या बड़े सैन्य अभियान की तैयारी का संकेत हो सकता है। इससे पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं और वैश्विक शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की आशंका है।
