ईरान और पाकिस्तान के रिश्ते समय के साथ कई उतार–चढ़ाव से गुजरे हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले का ईरान और आज का ईरान—दोनों की विदेश नीति और भारत-पाकिस्तान को लेकर रुख में बड़ा अंतर रहा है। ऐसे में अगर भविष्य में ईरान में फिर से राजशाही व्यवस्था लौटती है और पूर्व शाह के पुत्र रज़ा पहलवी सत्ता में आते हैं, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत और पाकिस्तान के लिए भी इसके गहरे रणनीतिक मायने होंगे।
शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल (1941–1979) में ईरान और पाकिस्तान के संबंध बेहद करीबी माने जाते थे। ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था जिसने 1947 में पाकिस्तान को मान्यता दी थी। उस दौर में दोनों देश अमेरिका के करीबी सहयोगी थे और सोवियत संघ के प्रभाव को रोकने के लिए एक-दूसरे पर भरोसा करते थे। शाह के समय ईरान की विदेश नीति अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष और पश्चिम समर्थक थी।
भारत-पाकिस्तान के 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान ईरान ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। शाह के नेतृत्व में ईरान ने पाकिस्तान को तेल और ईंधन की आपूर्ति की, साथ ही पाकिस्तानी वायुसेना को लॉजिस्टिक मदद और अपने एयरपोर्ट्स तक इस्तेमाल की अनुमति दी। उस समय ईरान की सोच थी कि क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरते भारत को संतुलित करने के लिए पाकिस्तान का मजबूत होना जरूरी है।
हालांकि 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति ने पूरे समीकरण बदल दिए। नया ईरान अमेरिका विरोधी बन गया, जिससे पाकिस्तान के साथ पुराने भरोसे जैसे रिश्ते नहीं रहे। उधर पाकिस्तान पर सऊदी अरब के बढ़ते प्रभाव और शिया-सुन्नी समीकरणों ने भी दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ा दी। इसी बदले हुए माहौल में ईरान ने भारत के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा जा सके।
अगर भविष्य में रज़ा पहलवी की सत्ता में वापसी होती है और ईरान में फिर से एक धर्मनिरपेक्ष, पश्चिम समर्थक शासन स्थापित होता है, तो भारत के लिए कुछ नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। चाबहार बंदरगाह जैसे भारत के लिए अहम रणनीतिक प्रोजेक्ट का महत्व कम हो सकता है। इसके अलावा ईरान-पाकिस्तान के बीच फिर से सैन्य और रणनीतिक सहयोग बढ़ने की संभावना बन सकती है, जो भारत की सुरक्षा दृष्टि से चिंता का विषय होगा। ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत-ईरान सहयोग कमजोर पड़ सकता है, जिससे भारत को खाड़ी देशों पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
इस तरह ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन न केवल मध्य-पूर्व की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत के लिए भी नए रणनीतिक दबाव और बदलते वैश्विक समीकरण लेकर आ सकता है।
