दक्षिण गुजरात की सबसे बड़ी मानी जाने वाली सूरत सिविल अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उधना क्षेत्र में रहने वाले 63 वर्षीय मोतीलाल गढ़वाल के मोतियाबिंद ऑपरेशन में हुई भारी लापरवाही से चिकित्सा जगत में हड़कंप मच गया है। ऑपरेशन के करीब डेढ़ महीने बाद भी जब बुजुर्ग की आंखों की रोशनी वापस नहीं आई और उन्होंने दूसरी अस्पताल में जांच करवाई, तब एक चौंकाने वाला सच सामने आया।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित की बहू आरतीबेन के अनुसार, 14 नवंबर 2025 को सूरत की पुरानी सिविल अस्पताल (लालीवाड़ी) में मोतीलाल गढ़वाल की आंख का मोतियाबिंद ऑपरेशन किया गया था। ऑपरेशन के दो दिन बाद जब पट्टी खोली गई, तब भी उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इस पर डॉक्टरों ने केवल आंखों में दवा डालने की सलाह दी और यह कहकर घर भेज दिया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
हालांकि, 1 दिसंबर 2025 को जब परिजन उन्हें नई सिविल अस्पताल की ओपीडी में लेकर गए, तो वहां जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ। डॉक्टरों ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान आंख में लेंस डाला ही नहीं गया था।
डॉक्टरों ने दिया गैर-जिम्मेदाराना जवाब
जब परिवार इस गंभीर शिकायत को लेकर दोबारा पुरानी सिविल अस्पताल के डॉक्टरों के पास पहुंचा, तो डॉक्टरों ने अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय अजीबो-गरीब तर्क दिए। डॉक्टरों का कहना था कि उम्र अधिक होने के कारण आंख का लेंस नीचे खिसक गया होगा। इतना ही नहीं, उन्होंने चश्मे का नंबर लिखकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की।
लेकिन जब परिजनों ने चश्मे की दुकान पर जांच करवाई, तो वहां भी यह पुष्टि हुई कि ऑपरेशन तो हुआ है, लेकिन आंख के अंदर लेंस मौजूद ही नहीं है।
परिवार की पुलिस शिकायत की चेतावनी
पीड़ित परिवार ने अस्पताल प्रशासन से इस पूरे मामले की लिखित रिपोर्ट मांगी, लेकिन अस्पताल की ओर से रिपोर्ट देने से इनकार कर दिया गया। आखिरकार, पुलिस में शिकायत करने की चेतावनी देने के बाद डॉक्टरों ने मंगलवार को मिलने के लिए बुलाया है।
परिवार का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के कारण उनके बुजुर्ग परिजन को अपनी दृष्टि गंवानी पड़ी है और डॉक्टर सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। परिवार ने साफ कहा है कि वे इस मामले में कानूनी कार्रवाई करेंगे।
अन्य मरीजों को लेकर भी आशंका
इस घटना के बाद यह आशंका भी जताई जा रही है कि संबंधित डॉक्टरों ने अन्य मरीजों के साथ भी इसी तरह की लापरवाही की हो सकती है। अब सवाल यह है कि इतने बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता की निगरानी आखिर कौन कर रहा है।
