पढ़े गुजरात’ और ‘विकसित गुजरात’ जैसे नारों के बीच लोकतंत्र के मंदिर मानी जाने वाली गुजरात विधानसभा की कार्यप्रणाली को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात विधानसभा में पूरे साल में औसतन केवल 22 दिनों तक ही सत्र आयोजित होते हैं। इसका मतलब यह है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए विधायकों को साल भर में एक महीने से भी कम समय मिल पाता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विधानसभाओं की बैठकों के आंकड़ों के विश्लेषण में गुजरात की स्थिति कमजोर नजर आती है। जिन राज्यों में सबसे ज्यादा विधानसभा सत्र होते हैं, उनकी सूची में गुजरात 12वें स्थान पर है। वर्ष 2017 से 2024 के बीच सबसे अधिक बैठकें आयोजित करने वाले राज्यों की सूची में भी गुजरात 10वें स्थान पर रहा। वर्ष 2025 में विधानसभा के केवल दो सत्र (फरवरी-मार्च और सितंबर) आयोजित हुए, जिनमें कुल मिलाकर सिर्फ 27 दिन ही कामकाज हुआ। वहीं 2022 से 2024 के दौरान भी साल में केवल एक या दो सत्र ही बुलाए गए।
वर्ष 2002 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले ‘संविधान समीक्षा आयोग’ ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि बड़े राज्यों में विधानसभा की बैठकें कम से कम 90 दिनों तक होनी चाहिए, जबकि छोटे राज्यों में यह संख्या 50 दिन होनी चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा के लिए क्रमशः 120 और 100 दिनों की बैठकें सुझाई गई थीं। इसके मुकाबले गुजरात जैसे बड़े और विकसित राज्य में साल में केवल 22 से 27 दिनों की बैठकें होना इन सिफारिशों से काफी दूर है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कई अहम कारण हो सकते हैं।
– सरकार और विपक्ष के बीच जनहित के मुद्दों पर लंबी और गहन बहस की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।
– कम सत्रों के कारण विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने का सीमित अवसर मिलना।
– सत्तारूढ़ दल के पास प्रचंड बहुमत होने के कारण विधेयकों को जल्दी पारित कर दिया जाना और चर्चाओं को सीमित रखना।
गुजरात के विधायक जनता द्वारा दिए गए टैक्स के पैसों से पूरे साल वेतन और भत्ते प्राप्त करते हैं। यदि विधानसभा की बैठकें ही इतनी कम होंगी, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर गंभीर और विस्तृत चर्चा कैसे संभव होगी? यह स्थिति न केवल लोकतंत्र की गरिमा, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
