दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पारिवारिक विवादों में हर बार ससुराल पक्ष को ही दोषी ठहराना सही नहीं है, क्योंकि कई मामलों में महिलाएं भी कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। न्यायालय ने माना कि संबंधित मामले में पत्नी ने अधिक धन प्राप्त करने के उद्देश्य से दहेज कानून का दुरुपयोग किया।
दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया के दौरान पत्नी द्वारा बार-बार नई मांगें रखना उसके लालची रवैये को दर्शाता है। कोर्ट के अनुसार, महिला ने अपने पति और ससुर के खिलाफ दहेज उत्पीड़न की शिकायत सिर्फ अधिक से अधिक पैसा ऐंठने के लिए दर्ज कराई थी। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि दहेज उत्पीड़न कानून का दुरुपयोग किया गया है और ऐसे मामलों को रोकना बेहद जरूरी है।
पीठ ने यह भी कहा कि बीते कई वर्षों से आरोपी पति और उसका परिवार अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर काटने को मजबूर था। मामले की गहन जांच के बाद हाईकोर्ट ने पति और ससुर को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए उन्हें क्लीन चिट दे दी।
कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि दोनों का विवाह वर्ष 2009 में हुआ था, जबकि महिला ने वर्ष 2011 में ही पति का घर छोड़ दिया था और उसके बाद कभी वापस नहीं लौटी। इसके बावजूद महिला ने वर्ष 2016 में पति और ससुर के खिलाफ दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। मध्यस्थता के दौरान महिला ने पहले एक फ्लैट की मांग की और बाद में 50 लाख रुपये की मांग रखी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ितों को न्याय दिलाना है, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उसका दुरुपयोग करना। ऐसे मामलों में न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह कानून के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाए और निर्दोष लोगों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाए।
