बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की आजीवन अध्यक्ष बेगम खालिदा ज़िया का 30 दिसंबर की सुबह निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में दशकों से चली आ रही चर्चित प्रतिद्वंद्विता, जिसे ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ कहा जाता था, का भी अंत हो गया। खालिदा ज़िया को बांग्लादेश के इतिहास में भले ही ‘आयरन लेडी’ और ‘लोकतंत्र की मां’ के रूप में जाना जाता हो, लेकिन राजनीति तक उनका सफर आसान नहीं रहा।
खालिदा ज़िया का जन्म 15 अगस्त 1945 को जलपाईगुड़ी (तत्कालीन अविभाजित बंगाल, वर्तमान भारत) में हुआ था। बाद में उनका परिवार बांग्लादेश के दिनाजपुर में बस गया। एक सामान्य गृहिणी के रूप में जीवन जी रही खालिदा ज़िया ने कभी नहीं सोचा था कि वे देश की सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल होंगी।
राजनीति में कैसे हुई एंट्री?
साल 1959 में मात्र 15 वर्ष की उम्र में उनका विवाह पाकिस्तानी सेना के कैप्टन ज़ियाउर रहमान से हुआ। ज़ियाउर रहमान बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक थे और बाद में 1977 में देश के राष्ट्रपति बने। उस समय तक खालिदा ज़िया घरेलू जीवन तक ही सीमित थीं और अपने दो बेटों—तारिक रहमान और अराफात रहमान—की परवरिश में जुटी थीं।
लेकिन 30 मई 1981 को चटगांव में एक असफल सैन्य विद्रोह के दौरान ज़ियाउर रहमान की हत्या कर दी गई। इस दर्दनाक घटना ने खालिदा ज़िया की जिंदगी की दिशा ही बदल दी और उन्हें राजनीति में कदम रखने के लिए मजबूर कर दिया।
बिखरती पार्टी को दिया नेतृत्व
पति की हत्या के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) टूटने की कगार पर थी। पार्टी कार्यकर्ताओं के आग्रह पर खालिदा ज़िया ने 1982 में पार्टी की सदस्यता ली और 1984 में पार्टी अध्यक्ष बनीं। इसके बाद उन्होंने तत्कालीन सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र की बहाली के लिए व्यापक आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्हें कई बार नजरबंद किया गया और जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा।
बनीं बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री
साल 1990 में इरशाद शासन के पतन के बाद 1991 में हुए आम चुनावों में BNP की जीत हुई और खालिदा ज़िया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। उनका पहला कार्यकाल आर्थिक सुधारों, निर्यात में वृद्धि और ‘केयरटेकर गवर्नमेंट सिस्टम’ की शुरुआत के लिए जाना जाता है।
वे 2001 में दोबारा सत्ता में लौटीं, हालांकि उनके दूसरे कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोपों और कट्टरपंथ से जुड़े विवादों की छाया भी रही। इसके बावजूद, जनता के एक बड़े वर्ग का समर्थन उन्हें लगातार मिलता रहा।
पति की हत्या, जेल की सज़ाएं, राजनीतिक संघर्ष और जनता के विश्वास के बल पर खालिदा ज़िया ने खुद को बांग्लादेश की राजनीति में एक मजबूत और अडिग नेता के रूप में स्थापित किया। यही वजह है कि इतिहास उन्हें हमेशा बांग्लादेश की ‘आयरन लेडी’ के नाम से याद रखेगा।
