अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का असर अब वहां रह रहे भारतीयों पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, H-1B वीज़ा नियमों में किए गए बदलावों के बाद अमेरिका में भारतीय पेशेवरों और भारतीय मूल के उद्यमियों के खिलाफ नफरत और भेदभाव का माहौल तेजी से बढ़ा है।
ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीज़ा से जुड़े नियमों को और सख्त कर दिया है। वीज़ा आवेदन की फीस बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दी गई है। इसके साथ ही अब वीज़ा देने में ज्यादा सैलरी वाली नौकरियों को प्राथमिकता दी जाएगी। फरवरी से लागू होने वाले नए नियमों के तहत सबसे अधिक वेतन पाने वाले लेवल-4 आवेदकों को ही वरीयता मिलेगी। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ये बदलाव स्थानीय कामगारों की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं, लेकिन इसके चलते कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए वीज़ा हासिल करना पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो जाएगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बड़ी अमेरिकी कंपनियों और भारतीय मूल के सीईओ को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि ये कंपनियां अवैध रूप से भारतीयों को नौकरियां दे रही हैं। हाल ही में फेडएक्स के भारतीय मूल के सीईओ राज सुब्रमण्यम के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आईं, जिनमें “अमेरिकी कंपनियों पर भारतीय कब्जा रोकने” जैसी बातें कही गईं।
नफरत और हिंसा की घटनाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एडवोकेसी ग्रुप ‘स्टॉप AAPI हेट’ के अनुसार, नवंबर महीने में दक्षिण एशियाई समुदाय के खिलाफ हिंसा की धमकियों में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर गाली-गलौज और अपशब्दों के इस्तेमाल में 69 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है। सोशल मीडिया पर भारतीयों को ‘जॉब थीफ’ यानी नौकरी चोर और ‘वीज़ा स्कैमर’ जैसे शब्दों से ट्रोल किया जा रहा है।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट के निदेशक राकिब नाइक ने चेतावनी दी है कि यह सब एक संगठित अभियान का हिस्सा हो सकता है। खास तौर पर उन भारतीय-अमेरिकी व्यवसायों को निशाना बनाया जा रहा है, जिन्होंने सरकारी ऋण लिया है। इस नकारात्मक माहौल के चलते कई कंपनियों ने अपनी समावेशी नीतियों को फिलहाल के लिए रोक दिया है, जिससे अमेरिकी समाज में नस्ली और सामाजिक तनाव और गहराने की आशंका जताई जा रही है।
